"कभी किसी रोज"
सुनना चाहता हूँ तुम्हे
बैठ खुले आसमान के नीचे सारी रात
चुनना चाहता हूँ रात भर
तुम्हारे होठों से झरते मोतियों को
अपनी पलकों से एक एक कर
भरना चाहता हूँ अपनी हथेलियों में
चाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.
सुनना चाहता हूँ तुम्हे
बैठ खुले आसमान के नीचे सारी रात
चुनना चाहता हूँ रात भर
तुम्हारे होठों से झरते मोतियों को
अपनी पलकों से एक एक कर
भरना चाहता हूँ अपनी हथेलियों में
चाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.
wonderful...very beautiful to see how u expressed your expression....
ReplyDeleteNice one.....
वह रात जो समय की
ReplyDeleteसीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.
nice composition
अपनी पलकों से एक एक कर
ReplyDeleteभरना चाहता हूँ अपनी हथेलियों में
चाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू
good one mam as always
ReplyDeleteसुनना चाहता हूँ तुम्हे
ReplyDeleteबैठ खुले आसमान के नीचे सारी रात
चुनना चाहता हूँ रात भर
तुम्हारे होठों से झरते मोतियों को
well composed
ReplyDeleteRegards
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
ReplyDeleteतुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा
महसूस करना चाहता हू
ReplyDeleteतुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
ReplyDeleteतुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
maine bhi kuch kah hee diya seemaa ji ,magar aapke blog par....!!
ReplyDeleteतुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
ReplyDeleteवह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.
बहुत सुदर कविता ......
ReplyDeleteचाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू
प्यार के सात रंगों से रंगी, किसी को भी प्यार के उन सुखद और गहरे भावो में ले जाती है आपकी कविता .....
आपकी और सुंदर कविताओ के इंतजार में ......
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
ReplyDeleteवह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा
lovely poem... emotionally envelops the agony and pain in rememebring ur beloved...
ReplyDeleteखूबसूरत विचार, सुन्दर अभिव्यक्ति, सफल कतिवा, हार्दिक बधाई।
ReplyDeleteवह रात जो समय की
ReplyDeleteसीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
ReplyDeleteवह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
ReplyDeleteवह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा
महसूस करना चाहता हू
ReplyDeleteतुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.
भरना चाहता हूँ अपनी हथेलियों में
ReplyDeleteचाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात