Expect nothing, live frugally on surprise.

Wednesday, January 7, 2009

"कभी किसी रोज"

"कभी किसी रोज"
सुनना चाहता हूँ तुम्हे
बैठ खुले आसमान के नीचे सारी रात
चुनना चाहता हूँ रात भर
तुम्हारे होठों से झरते मोतियों को
अपनी पलकों से एक एक कर
भरना चाहता हूँ अपनी हथेलियों में
चाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.

20 comments:

Amit January 7, 2009 at 9:53 AM  

wonderful...very beautiful to see how u expressed your expression....
Nice one.....

Shreya Rajput January 7, 2009 at 10:10 AM  

वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.
nice composition

Anonymous,  January 7, 2009 at 10:19 AM  

अपनी पलकों से एक एक कर
भरना चाहता हूँ अपनी हथेलियों में
चाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू

Anonymous,  January 7, 2009 at 10:52 AM  

good one mam as always

Er. Snigddha Aggarwal January 7, 2009 at 11:32 AM  

सुनना चाहता हूँ तुम्हे
बैठ खुले आसमान के नीचे सारी रात
चुनना चाहता हूँ रात भर
तुम्हारे होठों से झरते मोतियों को

Jyoti Dixit January 7, 2009 at 11:52 AM  

तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा

Dr. Pragya bajaj January 7, 2009 at 12:10 PM  

महसूस करना चाहता हू
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की

Er. Nidhi Mishra January 7, 2009 at 4:39 PM  

तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) January 8, 2009 at 1:04 AM  

maine bhi kuch kah hee diya seemaa ji ,magar aapke blog par....!!

Anonymous,  January 8, 2009 at 1:43 AM  

तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.

Dev January 8, 2009 at 11:27 AM  

बहुत सुदर कविता ......
चाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू
प्यार के सात रंगों से रंगी, किसी को भी प्यार के उन सुखद और गहरे भावो में ले जाती है आपकी कविता .....
आपकी और सुंदर कविताओ के इंतजार में ......

Preeti January 8, 2009 at 3:42 PM  

तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा

Anonymous,  January 9, 2009 at 11:34 AM  

lovely poem... emotionally envelops the agony and pain in rememebring ur beloved...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ January 9, 2009 at 11:40 AM  

खूबसूरत विचार, सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति, सफल कतिवा, हार्दिक बधाई।

Er. Puja Kapoor January 9, 2009 at 7:40 PM  

वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.

Er. Nidhi Mishra January 14, 2009 at 11:11 PM  

तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.

Er. Paayal Sharma January 16, 2009 at 2:51 AM  

तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा

Ria Taneja January 16, 2009 at 9:17 AM  

महसूस करना चाहता हू
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.

Ashok January 16, 2009 at 9:31 AM  

भरना चाहता हूँ अपनी हथेलियों में
चाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात

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