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Friday, March 20, 2009

"वादों के पुष्प"


"वादों के पुष्प"

बिखेरता रहा वादों के पुष्प वो
मै आँचल यकीन का बिछाये
उन्हें समेटती रही....

अपने स्पर्श की नमी से वो
उन पुष्पों को जिलाता रहा
मै मासूम शिशु की तरह
उन्हें सहेजती रही......

हवाओं को रंगता रहा वो
इन्द्रधनुषी ख्वाबो की तुलिका से
मै बंद पलकों मे
उन्हें बिखेरती रही ....

आज सभी वादों का वजूद
अपना आस्तित्व खोने लगा .......
मै अवाक टूटते मिटते हुए
उन्हें देखती रही........

7 comments:

Hobo ........ ........ ........ March 18, 2009 at 3:11 PM  

आज मै उन्हें देखती रही ख्वाब बिखेरती रही ...

अनिल कान्त : March 18, 2009 at 4:48 PM  

बहुत ही प्रभावशाली लिखा है

हवाओं को रंगता रहा वो
इन्द्रधनुषी ख्वाबो की तुलिका से
मै बंद पलकों मे
उन्हें बिखेरती रही ....


मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

creativekona March 26, 2009 at 12:38 AM  

अपने स्पर्श की नमी से वो
उन पुष्पों को जिलाता रहा
मै मासूम शिशु की तरह
उन्हें सहेजती रही......
सीमा जी ,
बहुत खूबसूरत और भावनात्मक कविता ..
बधाई स्वीकारें .
हेमंत कुमार

ARUNA March 31, 2009 at 11:31 PM  

school mein padhti thi hindi kavitaayen......aaj phir se padhne ko mila!!!

raj April 5, 2009 at 4:24 PM  

bikherta raha wado ke pushp wo main aanchal yakeen ka bichhaye unhe smetti rahee.....kahi na kahi mere ahsaas hai ye....boht hi achha....

Shweta Saxena April 8, 2009 at 4:34 PM  

आज सभी वादों का वजूद
अपना आस्तित्व खोने लगा .......
मै अवाक टूटते मिटते हुए
उन्हें देखती रही........

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